By— ऋचा तिवारी
“एक दुल्हन के मन की बात…
तब और गहरी हो जाती है,
जब शादी सिर्फ दो लोगों की नहीं,
बल्कि दो दुनियाओं की होती है।“
लाल जोड़ा और दुनिया का पीछे छूट जाना
शादी… सिर्फ लाल जोड़ा पहन लेने या हाथों में रचे गाढ़े महँदी के रंग कानाम नहीं होता। यह धीरे-धीरे अपनी हँसती-खेलती पूरी दुनिया को पीछे छोड़देने का एक मौन समझौता है।
मैं ऋचा तिवारी, इंदौर की एक बेहद साधारण सी लड़की। मेरी शादी दिसंबर2016 में हुई थी। पूरी तरह से एक पारंपरिक ‘अरेंज्ड मैरिज’ (Arranged Marriage)। मई के महीने में बात पक्की हुई, जुलाई में सगाई का शगुनहुआ और फिर तारीखें बदलते-बदलते देखते ही देखते दिसंबर का वह हफ़्ताभी आ गया, जिसने मेरी ज़िंदगी को हमेशा के लिए दो हिस्सों में बाँट दिया।
अक्सर लोग बहुत आसानी से कह देते हैं ना— “अरे! अरेंज्ड हो या लव… शादी तो हर किसी की होती ही है। इसमें नया क्या है?”
हाँ, होती तो है। हर दिन, हर शहर में हज़ारों शादियाँ होती हैं। लेकिन शायदकोई यह कभी नहीं समझ पाता कि एक लड़की सिर्फ शादी नहीं करती; वहअपनी तेईस साल की पूरी ज़िंदगी को एक छोटे से सूटकेस में समेटकर एकअनजान घर की चौखट पर ले जाती है।
तेईस साल का बचपन और ‘मायके’ का जन्म
तेईस साल… पूरे तेईस साल मैंने जिस घर में बिताए, जिस कमरे की हरदीवार मेरे बचपन की गवाह थी, जहाँ मेरी बेफ़िक्र हँसी गूँजती थी, जहाँरूठना और मनाना रोज़ का सिलसिला था, एक झटके में वह सब कुछपराया हो जाता है।
उस घर में एक ऐसी माँ थी जो बिना मेरे कुछ बोले, सिर्फ मेरी आँखों की नमीदेखकर मेरा डर समझ जाती थी। एक ऐसे पापा थे जो दफ़्तर से थककरआने के बाद भी सिर्फ मेरा चेहरा देखकर पहचान लेते थे कि आज मेरीतबीयत या मेरा मूड ठीक नहीं है। लेकिन विदाई के उस एक लम्हे के बाद, अचानक वही घर, वही कमरा, वही आँगन हमेशा के लिए “मायका” बनजाता है।
सच कहूँ? इस दुनिया में इस एक शब्द के बदलने से ज़्यादा डरावनी चीज़मुझे आज तक कोई दूसरी नहीं लगी। जो घर मेरा वजूद था, वह अचानकएक पल में ‘दूसरा घर’ घोषित कर दिया जाता है।
समाज का स्याह चेहरा और काँपता हुआ दिल
इस डर की परतें तब और गहरी हो जाती हैं, जब सुबह की चाय के साथ हमअखबारों में खौफनाक खबरें पढ़ते हैं— “दहेज के लिए दुल्हन को जलादिया…”, “बहू को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया…”, “ससुराल वालोंकी प्रताड़ना से तंग आकर नवविवाहिता ने की आत्महत्या…”
तब दिल अंदर तक काँप जाता है। रूह कातर हो उठती है। एक लड़की जबशादी की वेदी पर बैठती है ना, तो वह सिर्फ आँखों में सुनहरे सपने लेकर नहींजाती; वह अपने भीतर हज़ारों अनकहे डर का एक भारी बोझ भी लेकर जातीहै।
उसे रह-रहकर लगता है कि— अगर शादी की रस्मों या दान-दहेज में कोईकमी रह गई तो? अगर मैं सबकी उम्मीदों की कसौटी पर खरी नहीं उतरी तो? अगर उन्हें मेरा रंग, मेरा रूप, मेरा ढंग पसंद नहीं आया तो? अगर किसी दिनमुझे सरेआम यह महसूस करा दिया गया कि इस घर की दीवारों पर मेराकोई हक नहीं है, तो मैं कहाँ जाऊँगी?
और सबसे ज़रूरी सवाल…क्या वो लोग मेरे माँ-पापा को भी उतनी हीइज़्ज़त और सम्मान देंगे, जितनी वो अपने माता-पिता को देते हैं? क्योंकिएक लड़की के लिए उसके माँ-बाप सिर्फ एक रिश्ता नहीं होते, वे उसकाआसमान होते हैं, उसकी पूरी कायनात होते हैं।
औरत होने की खूबसूरत और कठिन नियति
मैं आज भी, इतने सालों बाद भी अक्सर तन्हाई में सोचती हूँ… एक लड़कीसे ही आखिर इस समाज को इतनी उम्मीदें क्यों होती हैं? क्यों सिर्फ उसे हीअपना पूरा अतीत, अपना बचपन, अपना घर छोड़ना पड़ता है? क्यों वही हरनए रिश्ते की अदालत में खुद को बेगुनाह और सही साबित करने के लिएखड़ी रहे? क्यों हर बार समझौता (Adjust) सिर्फ औरत के हिस्से में ही आताहै?
लेकिन शायद… यही औरत होने की सबसे खूबसूरत और सबसे कठिन बातभी है।
हम अंदर से बिखरते हुए भी रिश्तों को समेटना जानती हैं। हम डर से काँपतेहुए भी होंठों पर मुस्कुराहट सजाना जानती हैं। हम अकेले में रोते हुए भीदुनिया के सामने बहुत सलीके से “मैं बिल्कुल ठीक हूँ” कहना जानती हैं।
और शायद इसी जादुई ताकत की वजह से विदाई के वक्त दुल्हनें सबसेज़्यादा खूबसूरत और पूजनीय लगती हैं। क्योंकि उस वक्त उनके चेहरे परसिर्फ पार्लर का मेकअप नहीं होता, बल्कि उनके भीतर हज़ारों भावनाओं का, डरों का, और उम्मीदों का एक पूरा समंदर उमड़ रहा होता है।
उम्मीद का दीया और एक नया सवेरा
दिसंबर 2016 के उस दिन मैं भी बहुत डरी हुई थी। बहुत ज़्यादा। लेकिन उनतमाम डरों और आँसुओं के बीच, मेरे दिल के किसी कोने में एक छोटी सीउम्मीद का दीया भी जल रहा था।
एक उम्मीद कि शायद… कोई मुझे मेरी रूह तक समझेगा। शायद कोई मुझेबदलने की ज़िद करने के बजाय, मैं जैसी हूँ, मुझे वैसे ही गले से लगाएगा।शायद कोई मुझे कभी यह अहसास नहीं होने देगा कि मैं इस घर के लिएपराई या बाहरी हूँ।
और सच कहूँ, दुनिया की हर लड़की ससुराल से कोई आलीशान महल यामहंगे गहने नहीं चाहती। उसे बस एक ऐसा जीवनसाथी चाहिए होता है, जोज़िंदगी की सबसे बड़ी लड़ाई या बदसूरत बहस में भी उसका हाथ न छोड़े।जो उसे “हमारे घर की बहू” (जिस पर सिर्फ ज़िम्मेदारियाँ हों) नहीं, बल्कि“अपने घर की बेटी” (जिस पर पूरा अधिकार और प्यार हो) महसूस कराए।
क्योंकि शादी सिर्फ दो शरीरों या दो परिवारों का मिलन नहीं है; यह एकलड़की का पूरा पुनर्जन्म होता है। वह उसी दिन, उसी मंडप में थोड़ी और बड़ीहो जाती है। थोड़ी और मज़बूत हो जाती है… और कहीं अंदर से थोड़ी सीटूट भी जाती है।
आज इतने सालों बाद, जब मैं एक माँ और एक सुलझी हुई औरत के रूप मेंपीछे मुड़कर देखती हूँ ना… तो मुझे उस तेईस साल की सहमी हुई, डरी हुईऋचा को ज़ोर से गले लगाने का मन करता है। मैं उसके कान में धीरे सेकहना चाहती हूँ—
“ऋचा, तुम्हारा वह डरना बिल्कुल ठीक था… क्योंकि ज़िंदगी के इतने बड़ेबदलाव से पहले हर लड़की डरती है। लेकिन यकीन रखो, अगर सफ़र मेंसाथ देने वाला इंसान सही हो, वफ़ादार हो… तो वही अजनबी डर धीरे-धीरेतुम्हारा सबसे प्यारा घर बन जाता है।”
और शायद… यही इस खूबसूरत रिश्ते की सबसे बड़ी सच्चाई और सबसेहसीन दास्ताँ है। इसी अधूरेपन, इसी डर और इसी अटूट हौसले को मैंनेअपनी इन चंद पंक्तियों में समेटने की कोशिश की है, जो आज भी हर दुल्हनके दिल की गूँज हैं—
एक दुल्हन के मन की बात
आज आईने में खुद को दुल्हन बने देखा तो दिल ने धीरे से पूछा—
“क्या सच में अब जाना होगा?”
ये वही घर था जहाँ मेरी हँसी बड़ी हुई,
जहाँ माँ की यादें अब भी दीवारों में सांस लेती हैं।
जहाँ पापा की आवाज़ आज भी शाम के सन्नाटों में सुनाई देती है,
और जहाँ हर कोने में मेरी अधूरी बचपन वाली ज़िदें पड़ी हैं।
आज उसी घर से मुझे विदा होना है।
लाल जोड़े में सजी हूँ,
हाथों में मेहंदी भी है,
माथे पर सिंदूर का सपना भी… फिर भी ना जाने क्यों दिल काँप रहा है।
नई ज़िंदगी का डर आँखों में चुपचाप उतर आया है।
क्या सच में कोई अजनबी घर मेरा अपना बन जाएगा?
क्या मैं वहाँ भी इतनी ही खुलकर हँस पाऊँगी?
क्या मेरी खामोशियाँ कोई समझ पाएगा?
या फिर मैं बस रिश्तों को निभाते-निभाते खुद को कहीं पीछे छोड़ दूँगी?
दुल्हन बनना सिर्फ सजना नहीं होता,
ये धीरे-धीरे अपने ही हिस्सों को छोड़ना भी होता है।
आज जब सब मेरी मुस्कुराहटों की तारीफ़ कर रहे हैं,
कोई नहीं देख पा रहा कि आँखों के अंदर एक छोटी सी लड़की डरी हुई बैठीहै।
वो लड़की जो अभी भी चाहती है कि कोई आकर कह दे— “मत जाओ… यहीं रह जाओ।”
लेकिन ज़िंदगी रोकती कहाँ है किसी को।
तो आज मैं अपनी यादें समेटकर,
अपनी माँ की दुआओं को दिल से लगाकर,
एक नए सफ़र की ओर बढ़ रही हूँ।
डर भी है… आँसू भी हैं… लेकिन कहीं ना कहीं एक छोटी सी उम्मीद भी है—
कि शायद इस बार किस्मत मुझे टूटने नहीं देगी।
अंतिम अल्फ़ाज़
शादी एक विदाई ज़रूर है, पर यह वजूद का ख़त्म होना नहीं, बल्कि एक नएआसमान की तलाश है। हम औरतें अपने ही कुछ हिस्सों को पीछे छोड़ तोदेती हैं, पर जहाँ जाती हैं, वहाँ एक नया जहाँ बसाने का हौसला भी रखती हैं।इस नए सफ़र में बस यही एक छोटी सी उम्मीद हर दुल्हन को मुकम्मलबनाती है।
— ऋचा (hymn) ✨







Leave a Reply