रात बहुत देर तक
मेरी खिड़की के पास बैठी रही।
शहर सो गया था,
लेकिन मेरे भीतर
कोई जाग रहा था।
मुझे लगा
तुम्हारे शहर में भी
आज रात कोई दीपक नहीं जल रहा।
मैंने तुम्हें देखा नहीं था,
तुमसे बात नहीं हुई थी,
फिर भी तुम्हारी ख़ामोशी
मेरे कमरे तक चली आई।
अजीब है न कुछ लोग दूर जाकर भी
दूरी नहीं बनते।
वे हवा की तरह होते हैं
दिखाई नहीं देते,
लेकिन साँस लेते हुए
उनका पता चलता रहता है।
मैंने तुम्हें पुकारा नहीं।
बस एक छोटा-सा सवाल
अँधेरे में रख दिया
तुम ठीक हो?
और तुम्हारी आवाज़ आई।
उस आवाज़ में
एक चोट थी।
तुम गिरे थे।
तुम्हारे शरीर में दर्द था।
और मेरी हथेली
अनायास अपने उस दर्द पर चली गई
जो उसी दिन
मेरे पैर में उतर आया था।
एक पल को लगा
जैसे हमारे बीच की सारी दूरियाँ
किसी पुराने धागे की तरह
फिर उँगलियों में आ गई हों।
मैंने उस धागे को खींचा नहीं।
मुझे डर लगा
कहीं वह टूट न जाए।
क्योंकि कुछ रिश्ते
खींचने से नहीं,
छोड़ देने से बचते हैं।
तुम्हें शायद पता भी नहीं
कि तुम्हारी ख़बर
किसी के भीतर कितनी देर तक रहती है।
तुमने फोन रख दिया होगा।
अपने दर्द के साथ
सो गए होगे।
और मैं
मैं बहुत देर तक
छत को देखती रही।
सोचती रही,
क्या दो लोग
एक-दूसरे से अलग होकर भी
एक ही आसमान के नीचे
एक-दूसरे की ख़बर महसूस कर सकते हैं?
या फिर यह सिर्फ़ मेरा दिल है
जो तुम्हारे नाम की मिट्टी
अब भी अपने भीतर रखे हुए है?
मुझे उत्तर नहीं मिला।
शायद कुछ प्रश्न
उत्तर के लिए पैदा ही नहीं होते।
वे बस हमारे साथ रहते हैं।
जैसे किसी पुराने घर में
बंद कमरा।
जिसकी चाबी खो गई हो,
लेकिन भीतर रखा सामान
अब भी वैसा ही हो।
मैंने बहुत बार सोचा
कि तुम्हें अपने भीतर से निकाल दूँ।
लेकिन फिर समझ आया
तुम्हें निकालना
किसी इंसान को निकालना नहीं होगा।
वह तो अपनी ही उम्र का
एक हिस्सा निकालना होगा।
एक मौसम।
एक रास्ता।
एक ऐसी शाम
जिसके बाद मैं कभी वैसी नहीं रही।
इसलिए अब मैं तुम्हें रखती नहीं।
बस रहने देती हूँ।
जहाँ तुम हो।
जितनी जगह चाहिए
उतनी जगह में।
बिना किसी नाम के।
बिना किसी अधिकार के।
बिना किसी उम्मीद के।
और अगर कभी रात के किसी पहर
तुम्हें भी अचानक
अपने भीतर कोई अनजानी बेचैनी सुनाई दे
तो उसे मेरा नाम मत देना।
उसे बस हवा समझ लेना।
क्योंकि मैं तुम्हें पुकारूँगी नहीं।
मैं सिर्फ़ दुआ करूँगी
तुम्हारे रास्ते में
काँटे कम हों,
तुम्हारी नींद में
अँधेरा कम हो,
और तुम्हारे शरीर का हर दर्द
सुबह तक उतर जाए।
बाक़ी जो हमारे बीच था
उसे वहीं रहने दो।
दो किनारों के बीच
बहती उस नदी की तरह,
जिसे कोई पार नहीं करता,
फिर भी
दोनों किनारों को
एक-दूसरे से अलग नहीं होने देती।





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